MAHATMA GANDHI BIOGRAPHY

महात्मा गांधी


mahatma gandhi biography


राष्ट्रपिता

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के जनक ,प्रमुख राजनैतिक एवं एकल पथ आध्यात्मिक नेता।
भारतीय स्वतंन्त्रता के इतिहास की भारतीयों लेखको द्वारा जब भी बात की जाती है तो सबसे प्रथम महात्मा गांधी का नाम और उनके द्वारा किये गए आंदोलनों और उनके विचारों की प्रशंसा अवश्य की जाती है 

उनके विचारों से प्रभावित होकर संपूर्ण राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति में स्वतंन्त्रता की चेतना जागृत हुई।
उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा के मार्ग पर चल कर राष्ट्र को स्वतंन्त्रता और नागरिकों को उनके अधिकार दिलवाए ।

गांधी जी को किसानों का मित्र भी कहा जाता था। गांधी जी के द्वारा समाज में रहने बाले निन्म वर्ग के लोगो को भी उनके अधिकार दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाई। बाद में उन्हें महात्मा के नाम से जाना गया।उन्हें भारत का राष्ट्रपिता भी कहा जाता है।

सुभाष चन्द्र बोस ने वर्ष 1944 में रंगून रेडियो से गान्धी जी के नाम जारी प्रसारण में उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ कहकर सम्बोधित किया था।


सामान्य परिचय



पूर्ण नाम : मोहनदास कर्मचंद गांधी (महात्मा)
जन्म : 2 अक्टूम्बर 1869 पोरबंदर काठियावाड़ एजेंसी गुजरात
मृत्यु : 30 जनवरी 1948 (राजघाट )नई दिल्ली , दिल्ली
• पिता : कर्मचंद गांधी
• माता : पुतली बाई
• धार्मिक : हिन्दू धर्म
• जातीयता : गुजरती
• शिक्षा : यूनिवरसिटी ऑफ़ लन्दन
• व्यवसाय : राजनीतिज्ञ, वकील, दार्शनिक, क्रन्तिकारी, शुद्ध विचारक, पत्रकार, शिक्षक
• जीवनसाथी : कस्तूरबा गांधी
• प्रमुख विचार : सत्य, अहिंसा



प्रारंभिक जीवन

मोहनदास कर्मचंद गांधी mahatma gandhi का जन्म 2 अक्टूबर 1869 पोरबंदर कठियाबाड़ गुजरात के हिन्दू परिवार में कर्मचंद गांधी जी के यहाँ पर हुआ था उनके पिता ब्रिटिश राज के कठियाबाड़ कसबे के पोरबंदर के दीवान थे ।

गांधी जी की माता पुतलीबाई परनमी वैश्य समुदाय की थी और अत्यधिक समय धार्मिक अनुष्ठान और दूसरों की सेवा में व्यतीत करती थी वह नियमित रूप से व्रत रखती थीं और परिवार में किसी के बीमार पड़ने पर उसकी सेवा में दिन-रात एक कर देती थीं।

 इस प्रकार मोहनदास ने स्वाभाविक रूप से अहिंसा, शाकाहार, आत्मशुद्धि के लिए व्रत और विभिन्न धर्मों और पंथों को मानने वालों के बीच परस्पर सहिष्णुता को अपनाया।

जिसका प्रभाव हमें मोहनदास गांधी के जीवन में भी देखने को मिलता है । वह सदैव परम्परागत भारतीय पोशाक धोती व सूत से बनी शाल पहनते थे। सदैव शाकाहारी भोजन खाने वाले इस महापुरुष ने आत्मशुद्धि के लिये कई बार लम्बे उपवास भी रक्खे।


Mahatma Gandhi family tree

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प्रारंभिक शिक्षा

महात्मा गांधी जी की प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर में और हाई स्कूल की शिक्षा राजकोट में हुई। सन 1887 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अहमदाबाद से उत्तीर्ण की। इसके बाद मोहनदास ने भावनगर के शामलदास कॉलेज में दाखिला लिया पर ख़राब स्वास्थ्य रहने के कारण कॉलेज छोड़कर पोरबंदर वापस चले गए अपने परिवार और स्थानीय विद्यालय से हुई ।

बचपन में Mahatma Gandhi ji काफी शर्मीले और डरपोक हुआ करते थे । उन में क्रांतिकरि बाले कोई भी भाव नहीं थे मोहनदास शैक्षणिक स्तर पे औसत छात्र थे पर उनकी हस्तलेख अच्छा नहीं होने के कारण उन्हें शर्मिंदा होना पड़ता है । वह एक अच्छे विद्यार्थी थे और हमेशा सच का ही साथ देते थे सच बोलने का के लिए वो राजा हरिश्चंद्र जी से प्रभावित थे।

गांधी जी को संस्कृत सिखने में काफी दिक्कत होती थी जो उनके दोस्त कृष्णाशंकर ने उनकी उसमे सहायता की।


बचपन की बाते

गांधी जी के बचपन में एक दौर इस भी आया की उन्हें अनावश्यक चीज़ों की भी लात लग गयी थी। और इस बात को उन्होंने अपने पिता जी को बताने की सोची और उन्होंने अपने पिता जी को खत लिख कर सारी बात बताई जिससे उनके पिता कर्मचंद गांधी को दुःख हुआ लेकिन सब ठीक हो गया उसके बात गांधी जी को सच की शक्ति का अहसास हुआ।

" निर्बल के बल राम "

{महात्मा गांधी जी ने यहाँ जाना की मनुष्य के शारीर के दुर्बल होने से कोई फर्क नहीं पड़ता फर्क पड़ता है कि वह कितना ज्ञान रखता है और सत्य का साथ देता है}



वैवाहिक जीवन


मोहनदास करमचंद गांधी जी ( Mahatma Gandhi ) की शादी सन 1883 साडे 13 साल की उम्र में 14 साल की कस्तूरबा से हो गया।वह अपनी पत्नी से काफी प्रभावित थे और उनसे प्रेम करते थे।

कस्तूरबा जी शिक्षित नहीं थी पर काफी समझदार थी वह हमेशा गांधी जी का साथ देती थी। जब मोहनदास 15 वर्ष के थे तब इनकी पहली सन्तान ने जन्म लिया लेकिन वह केवल कुछ दिन ही जीवित रही। उनके पिता करमचन्द गाँधी भी इसी साल (1885) में चल बसे। बाद में मोहनदास और कस्तूरबा के चार सन्तान हुईं
पिता की मृतु का उन पर काफी गहरा प्रभाव पड़ता है।


विदेशी शिक्षा


Mahatma Gandhi in London

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मोहनदास अपने परिवार में सबसे ज्यादा पड़े लिखे थे और उनका यह मानना था कि जो विदेश से पढ़ाई करके आते है उनको काफी अच्छी समझ और ज्ञान होता है और उन्हें कम के भी अच्छे पैसे मिलते है

विदेश जाने में उन्हें उनके भाई ने सहायता की और मावजी दावे की सलाह परन्तु उनके विदेश जाने के विचार पर उनकी माता ने उनका विरोध किया परन्तु मोहनदास ने अस्वासन दे कर माता को विदेश जाने के लिया माना लिया और 1888 में उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ लन्दन में बेरिस्टर की पढ़ाई के लोए दाखिला लिया ।

लन्दन के जीवन स्तर में उन्हें ढालने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा उनके माता को दिए हुए वचन के मुताविक उन्होंने शाकाहारी भोजन और शराब का सेवन नहीं करना था इसके चलते उन्होंने शाकाहारी कॉलोनी को ढूंढ और फिर बाद में बहा के वेजिटेरिअन सोसायटी के सदस्य भी बने ।

सन 1891 में मोहनदास अपनी बेरिस्टर की पढ़ाई समाप्त कर भारत बापस लोटे और उन्होंने अपनी माता की मृतु की खबर मिले जिससे उन्हें काफी दुख हुआ क्योकि वह उनकी माँ के सबसे करीब और उनकी दी हुई प्रतिज्ञा का पालन किया था ।

कपितु उनको उनकी पढ़ाई का सही उपयोग में लाना था इसलिए उन्होंने बॉम्बे जेक वकालत की प्रैक्टिस की परन्तु सफलता नहीं मिली तो उन्होंने राजकोट बापस आ कर लोगो के लिए मुक़दमे की अर्जी लिखने लगे और बच्चो को इंग्लिश पड़ने लगे ।

उनकी मुलाकात गरीब से दिखने बाले नारायण हेमचंद्र से हुई वह एक लैंग्वेज ट्रांसलेटर थे और वेह नईज़ीलैंड जेक इंग्लिश सीखना कहते थे। गांधी जी उनके विचारों से प्रभावित हुए ओर उन्होंने जाना की

सन् 1893 मोहनदास जी के बड़े भाई के पास एक भारतीय फर्म से नेटल दक्षिण अफ्रीका में एक वर्ष के करार पर वकालत का कार्य स्वीकार


दक्षिण अफ्रीका में नागरिकता का संघर्ष (1893-1914)


गांधी जी ( Mahatma Gandhi )अपनी बकालत की असफलता के बाद भारत से बहार  जाना चाहते थे और उन्हें ये मौका नहीं जाने दिया और गाँधी 24 साल की उम्र में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। वह प्रिटोरिया स्थित कुछ भारतीय व्यापारियों के न्यायिक सलाहकार के तौर पर वहां गए थे।


दक्षिण अफ्रीका में रंग भेद का सामना करना पड़ा दक्षिण अफ्रीका में भारतीय नागरिकों को रंग भेद के कारण बहुत ही अपमानित किया जाता था और उनके साथ पक्षपात किया जाता था

एक बार जब गांधी जी को केस लड़ने नेटल जनता था तब बह मार्टज़बुर्ग से ट्रेन में प्रथम श्रेणी कोच की वैध टिकट होने के बाद तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने से इन्कार करने के कारण उन्हें ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। ये सारी घटनाएँ उनके के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ बन गईं और मौजूदा सामाजिक और राजनैतिक अन्याय के प्रति जागरुकता का कारण बनीं।


अफ्रीका में हो रहे ब्रिटिश साम्राज्य के द्वारा भारतीयों पर अत्यचार और अन्याय को देखते हुए उनके मन में भारतीयों की सामान और न्याय इरादा किया और उन्होंने विरोध किया|

दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी ने भारतियों को अपने राजनैतिक और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। चुनाव में भारतीय नागरिको को वोट देने का अधिकार दिलाया


सन 1906 के ज़ुलु युद्ध में भारतीयों को भर्ती करने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों को सक्रिय रूप से प्रेरित किया। गाँधी के अनुसार अपनी नागरिकता को कानूनी बनाने के लिए भारतीयों को ब्रिटिश युद्ध प्रयासों में सहयोग देने को कहा



भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में योगदान (1916-1945)


सन 1914 में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत बापस लोटे। इस समय तक गांधी जी राजनीतिक और न्यायिक योग्य के साथ ही एक राष्ट्रीय नेता के रूप में निपुण हो गए थे।


भारत में गोपाल कृष्ण गोखले से Mahatma Gandhi ji काफी प्रभावित थे और गांधी जी उनके कहने पर ही भारत बापस आए थे। गांधी जी ने भारत आके भारत के विभिन क्षेत्रो में भ्रमण किया और भारतीय नागरिकों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझ ।

सन 1915 में गांधी जी ने रहने के लिए एक अहमदाबाद में सत्याग्रह (सावरमती) नाम से एक आश्रम को स्थापित किया जिसमें उन्होंने आश्रम में सभी वर्गों के लोगो को रहने को अनुमति दी जो अपने काम के प्रति ईमानदार हो।

चंपारण सत्याग्रह

चंपारण में किसानों पर लगाए गए तिंकटिया पद्धति खेती से किसानों को खाद्य फसल के साथ ही नील की खेती करनी पड़ती थी जिसे ब्रिटिश जमीदार काम दामो में खरीद कर उन्हें महँगे तमो में बेचते थे जिससे किसानों की आर्थिक स्थति कमजोर हो गयी गांधीजी ने जमींदारों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन और हड़तालों का नेतृत्व किया जिसके बाद गरीब और किसानों की मांगों को माना गया।


खेड़ा सत्याग्रह

सन 1918 में गुजरात के खेड़ा में बाढ़ और सूखे के कारण किसानों के पास कर देने में असमर्थ थे जिससे किसानों की आर्थिक स्थति दयनीय हो गयी । गांधी जी ने ब्रिटिश जमीदारो को किसानों से रीढ़ माफ़ी के आस्वासन से किसानों की स्थति में सुधार आया बिहार के चम्पारण और गुजरात के खेड़ा में हुए आंदोलनों ने गाँधी को भारत में पहली राजनैतिक सफलता दिलाई।

खिलाफत आंदोलन

गांधी जी खिलाफत आंदोलन के जरिये राष्ट्र के विभिन वर्गो और राजनीतिक पार्टियों में अपनी पहचान बनाने कहते थे खिलाफत आंदोलन एक विश्वव्यापी आंदोलन था जिसमे अभी लोगो ने हिस्सा लिया था

कारण - खलीफा के गिरते प्रभुत्व को बचाने के लिए विश्व के सभी मुसलमानों द्वारा

प्रथम विश्व युद्ध में पराजित होने के बाद ओटोमन साम्राज्य विखंडित कर दिया गया था जिसके कारण मुसलमानों को अपने धर्म और धार्मिक स्थलों के सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई थी।

भारत में खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व गांधी जी के द्वारा किया गया और इसमें उनका साथ मुस्लिम लीग द्वारा किया गया गांधी जी ने मुसलमानों को एक जुट करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए गए सम्मान को बापस लोटा दिया।इसके बाद Mahatma Gandhi ji न सिर्फ कांग्रेस बल्कि देश के एकमात्र ऐसे नेता बन गए जिसका प्रभाव विभिन्न समुदायों के लोगों पर था।


असहियोग आंदोलन

इस समय तक गांधी जी की लोगो के बीच लोकप्रिय हो गए थे जिससे उनके द्वारा दिए गए हर एक भाषण को लोग सुनते था उनकी बातें मानते थे इसी समय गांधी जी ने असहियोग आंदोलन शुरू किया गांधी जी ने लोगो को ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार, स्कूल , नोकरियो में न जाने को कहा। उनका मानना था कि शांतिपुर्ण तरीके से अहिंसा के साथ विद्रोह करने से जान माल की हानि नहीं होगी और ब्रिटिश सरकार की कमर टूट जाएगी।

तभी सन 1919 में जलियाबाला बाग नरसंहार एक दुखद घटना के बाद जिससे जनता में क्रोध और हिंसा की ज्वाला भड़क उठी थी। और गांधी जी ने ब्रिटश सरकर द्वारा दी गयी उपाधि बापस लोटा दी जिसमे उनका साथ रविंद्रनाथ टैगोर ने भी दिया।


असहयोग आन्दोलन को सफलता मिल रही थी जिससे समाज के सभी वर्गों में जोश और भागीदारी बढ गई लेकिन फरवरी 1922 में इसका अंत चौरी-चौरा कांड के साथ हो गया। इस हिंसक घटना के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया। गांधी जी को राजद्रोह के मुक़दमे में 6 वर्ष की सजा हो गयी। अपनी तबियत बिगड़ने के चलते उन्हें रिहा कर दिया



नमक सत्याग्रह

असहयोग आन्दोलन के समय  गिरफ़्तारी के बाद गांधी जी सन 1924 में रिहा हुए सन 1928 तक राजनीति से दूर ही रहे।
वह स्वराज पार्टी और कांग्रेस के बीच के सम्बन्ध को कम करने में लगे रहे और अस्पृश्यता, शराब, अज्ञानता और गरीबी के विरुद्ध काम किया

अंग्रेजी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में भारत के लिए एक नया संवेधानिक सुधार आयोग बनाया पर उसका एक भी सदस्य भारतीय नहीं था जिसके कारण भारतीय राजनैतिक दलों ने इसका बहिष्कार किया।

दिसम्बर 1928 के कलकत्ता अधिवेशन में Mahatma Gandhi ji ने अंग्रेजो को भारतीय साम्राज्य को सत्ता प्रदान करने के लिए कहा और ऐसा न करने पर देश की आजादी के लिए असहयोग आंदोलन का सामना करने के लिए तैयार रहने के लिए भी कहा। अंततः कोई प्रतिक्रिया न होने पर

  •  31 दिसम्बर 1929 को लाहौर में भारत का झंडा फहराया गया
  •  26 जनवरी 1930 का दिन भारतीय स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया।

इसके बाद गांधी जी ने नमक पर कर लगाए जाने के विरोध में नमक सत्याग्रह चलाया जिसमें उन्होंने 12 मार्च से 6 अप्रेल तक अहमदाबाद से दांडी, गुजरात, तक लगभग 388 किलोमीटर 71 लोगो के साथ यात्रा की। इस यात्रा का मकसद स्वयं नमक तैयार करना था।

इसके बाद लार्ड इरविन ने गांधी जी के साथ विचार-विमर्श करने का निर्णय लिया जिसके महात्मा गांधी इरविन संधि पर मार्च 1931 में हस्ताक्षर हुए। संधि में ब्रिटिश सरकार ने सभी राजनैतिक कैदियों को रिहा करने के लिए सहमति दे दी। गांधी कांग्रेस की तरफ से लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया परन्तु यह सम्मेलन भारतीयों के लिए सफल नहीं रहा इसके बाद गांधी फिर से गिरफ्तार कर लिए गए और आंदोलन को रोकने की कोशिश की गयी

1934 में गांधी ने कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। गांधी ने राष्ट्र के निर्माण पर अपना ध्यान दिया।
ग्रामीण भारत को शिक्षित करने, छुआछूत के ख़िलाफ, कताई, बुनाई और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने और भारतीयों की शिक्षा प्रणाली में सुधार किया

हरिजन आंदोलन

दलित नेता भीमराव अम्बेडकर की कोशिश के बाद ब्रिटिश सरकार ने अछूतों के लिए एक नए निर्वाचन मंजूर कर दिया था। इसी समय जेल में बंद Mahatma Gandhi ji ने इसके विरोध में  1932 में छ: दिन का उपवास किया और सरकार को पूना पैक्ट को लागु करने को कहा अछूतों के जीवन को सुधारने के लिए गांधी जी द्वारा चलाए गए अभियान की शुरूआत थी


 देश का विभाजन और आजादी

जिन्ना के द्वारा ब्रिटिशो से एक अलग *मुस्लिम राष्ट्र* के रूप में पाकिस्तान की मांग की । गाँधी जी देश का बंटवारा नहीं चाहते थे और अंग्रेजों ने देश का विभाजन कर दिया।

गाँधी जी की भारत से बिदाई

30 जनवरी 1948 को Mahatma Gandhi ji की नाथूराम गोडसे के द्वारा गोली मार के हत्या कर दी गयी ये दिल्ली के ‘बिरला हाउस’ में हुई। गांधी जी के मुखः से अंतिम शव्द हे राम कहा और प्राण त्याग दिए। नाथूराम पर केस चला और 1949 में उन्हें मौत की सजा सुनाई गयी।

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